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psoriasis treatment overview

सोरायसिस स्व-प्रतिरक्षित रोग है जो रोगी की त्वचा पर उभर कर आता है. इस रोग में ग्रस्त क्षेत्र पर लाल और सफेद रंगत लिए हुए चिपते हुई संलागी परत पाई जाती है जिसमे अत्यंत दुखदायी पीड़ा एवं भयंकर असहनीय खुजलाहट होती है. रोगी को इतना कष्ट होता है कि उसका रात-दिन का चैन इस रोग के कारण नष्ट होजाता है.

असल में यह परत त्वचा का निर्माण करने वाली कोशिकाओं के अति तीव्र व अनियंत्रित जनन से उत्पन्न होती है. त्वचा की कोशिकाएँ जितनी तेज़ बढ़ती हैं उतनी ही गति से ये मार जाती है और नतीजा है. इस रोग का प्रभाव अधिकतर कुहनियों, घुटनों अथवा पीठ के निचले क्षेत्र और सिर के बालों की त्वचा में अधिक पाया जाता है.

सोरायसिस के कारण

यह रोग वात और पित्त के विकृत होने के कारण उत्पन्न होता है. यदि कम प्रबलता वाले अनेक विष शरीर में एकत्रित हो जाएँ तो यह रोग के घातक रूप से सामने आती हैं. अनियमित ख़ान-पॅयन संबंधी आदतें, विरुद्धहार इत्यादि से यह रोग उत्पन्न होता है.

गले अथवा ऊपरी श्वसन तंत्र में स्ट्रेपटोकॉकस (Streptococcus) नामक जीवाणु के संक्रमण से यह तकलीफ़ बढ़ जाती है. यदि धूप में रोगी ना बैठता हो तो भी यह तकलीफ़ ज़्यादा घातक रूप ले लेती है. साथ ही तनाव ग्रस्त रहने से और कुछ अँग्रेज़ी (allopathic) दवाइयाँ जैसे कि क्लोरोकिन (chloroquine), क्लॉर्प्रोपमाइड (Chlorpropamide), लीथियम (Lithium) और प्रेक्टल (practoal) से भी इस रोग में अभिवृद्धि पाई जाती है.

इस रोग के साथ-साथ कई लोगों को स्पोंडयलो अर्थ्रिटिज़ (spondyloarthritis: sero- negative arthritis) तथा अन्य संबंधित समायाएँ जैसे कि युरेत्राइटिस (urethritis), आँखों के जलन वाले रोग (eye inflammation diseases), कैंकर सोर्स (canker sores) भी उत्पन्न हो जाती है.

विरुद्धहार लेने से त्वचा के अनेक स्व-प्रतिरक्षित रोग उत्पन्न हो जाते हैं. विरुद्धाहार अर्थात वे भोजन जो एक-साथ नही लेने चाहिए जैसे कि मछली और दूध या इससे बने पदार्थ, नमक और दूध, बहुत अधिक दही खाना, काली माह की दाल, समुद्री जीवों (sea-food) को खाने से, खट्टे और नमक वाले पदार्थ खाने से यह रोग उत्पन्न हो सकता है. शराब और तंबाकू के सेवन से भी यह रोग शुरू हो सकता है. आयुर्वेद में रोग उत्पत्ति में आहार की महत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया है.