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tonsillitis overview

टॉन्सिल किसी भी उम्र में होने वाला एक समान्य सा संक्रमण हैं, लेकिन यह समस्या 14 वर्ष के कम के बच्चो में ज्यादा पाया जाता हैं। गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की गांठ जैसी होती है जो लसिका ग्रंथि के समान होती है, जिसे हम टॉन्सिल कहते हैं। मौसम बदलने पर, खासतौर पर सर्दियों में टॉन्सिल से पीड़ित रोगी की तकलीफें ज्यादा हो जाती हैं। अगर आप भी इस समस्या से पीड़ित है तो आज हम आपको टॉन्सिल के लक्षण, कारण, इलाज दवा और घरेलू नुस्खे बताने जा रहे हैं।

जब टॉन्सिल में संक्रमण हो जाता है तो इसे चिकित्सा की भाषा में टॉन्सिलाइटिस कहते है। आम भाषा में इसे टॉन्सिल होना या घाटी बढ़ना कहते है। जो की एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को लगने वाला रोग है। आइये टॉन्सिल और टॉन्सिलाइटिस के बारे में विस्तार से जानें।

टॉन्सिल्स (टॉन्सिलाइटिस) क्या होता है

टॉन्सिल्स गले के दोनों ओर स्थित लिम्फेटिक टिश्यु या ऊत्तक होते हैं। ये ऊत्तक बैक्टीरिया और संक्रमण से लड़कर सुरक्षा का कार्य करते हैं। ये उन बैक्टीरिया और वायरस को अपने में अवशोषित करते हैं जो शरीर के किसी अंग या भीतरी हिस्से को क्षति पहुंचा सकते हैं। यह काम टोन्सिल श्वेत रक्त कणों की मदद से करते है। आमतौर पर प्रत्येक टॉन्सिल 2.5 सेंटीमीटर लंबा, 2.0 सेमी चौड़ा और 1.2 सेमी मोटा होता है। टॉन्सिल्स अपने यौवनारंभ (puberty) के दौरान सबसे बड़े आकार तक पहुँच जाते हैं और इसके बाद धीरे-धीरे उनका क्षय होने लगता है। हालांकि, अगर गले की चौड़ाई से Tonsils आकार की तुलना की जाये, तो यह माप छोटे बच्चों में सबसे बड़ा होता है।

टॉन्सिलाइटिस क्या होती है

जब टॉन्सिल्स में संक्रमण की वजह से गले में सूजन, खरास, दर्द, निगलने में परेशानी जैसी समस्या हो तो ऐसे इन्फेक्शन को टॉन्सिलाइटिस कहते हैं। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को लगने वाला रोग है। यानि यह रोग कॉन्टेजियस होता है। इसके लक्षण आमतौर पर 7 से 10 दिनों तक देखे जा सकते हैं। एक बार टॉन्सिलाइटिस होने पर अगर यह प्रॉब्लम दोबारा छह महीने बाद हो तो वह नॉर्मल है। अगर यह समस्या हर एक-दो महीने में बार-बार हो रही हो तो यह क्रॉनिक हो जाती है जो की एक गंभीर स्वास्थय समस्या हैं।

एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में क्रोनिक टॉन्सिलाइटिस रोगियों की सबसे सामान्य आयु 11-20 वर्ष है। पुरुषों के लिए 62% और महिलाओं के लिए 38%। टॉन्सिलेक्टोमी के बाद होने वाली सबसे सामान्य जटिलताओं में हेमाटोमा (Hematoma; रक्त वाहिका के बाहर खून का असामान्य रूप से जमा होना) और बुखार थे।

किस मौसम में होता है
वैसे तो टॉन्सिलाइटिस इन्फेक्शन पूरे साल कभी भी हो सकता है लेकिन मौसम बदलने के दौरान यानी मार्च और सितंबर – अक्टूबर में इस इन्फेक्शन के होने का खतरा ज्यादा रहता है। इन महीनों में आप अपना ज्यादा ख्याल रखेंगे मसलन बहुत ठंडा – गरम , तीखा आदि न खाएं तो टॉन्सिलाइटिस से बच सकते हैं।

किस उम्र में खतरा ज्यादा
टॉन्सिलाइटिस किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है , लेकिन 14 साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा ज्यादा होता है।

टॉन्सिल्स के प्रकार

i) 1. एक्यूट टॉन्सिलाइटिस (Acute tonsillitis) – एक जीवाणु या वायरस टॉन्सिल्स को संक्रमित करता है, जिसके कारण गले में सूजन और खराश होती है। टॉन्सिल एक ग्रे या सफेद रंग की कोटिंग विकसित कर सकता है।
ii) 2. क्रोनिक टॉन्सिलाइटिस (Chronic tonsillitis) – टॉन्सिल्स में बार-बार होने वाले संक्रमण, कभी-कभी एक्यूट टॉन्सिलाइटिस के बार-बार होने के परिणामस्वरूप क्रोनिक टॉन्सिलाइटिस होता है।
iii) 3. पेरिटॉन्सिलर फोड़ा (Peritonsillar abscess) – संक्रमण से टॉन्सिल के पास मवाद इकट्ठा हो जाता है, जो इसे विपरीत दिशा की ओर धकेलता है। पेरिटॉन्सिलर फोड़ों को तत्काल सुखा देना चाहिए।
iv) 4. एक्यूट मोनोन्यूक्लिओसिस (Acute mononucleosis) यह आमतौर पर एप्सटीन बरर वायरस (Epstein Barr Virus) की वजह से होता है। ‘मोनो’ के कारण टॉन्सिल्स में गंभीर सूजन, बुखार, गले में खराश, लाल चकत्ते और थकान हो सकती है।
v) 5. स्ट्रेप थ्रोट (Strep throat)– स्ट्रेप्टोकोकस (Streptpcpccus) नामक एक जीवाणु (बैक्टीरिया) टॉन्सिल और गले को संक्रमित करता है। गले की खराश के साथ अक्सर बुखार और गर्दन मेँ दर्द भी होता है।
vi) 6. टॉन्सिलोइथ्स या टॉन्सिल स्टोन्स (Tonsilloliths or Tonsil Stones)–टॉन्सिल स्टोन्स या टॉन्सिलोइथ्स तब बनते हैं, जब यह फंसा हुआ अपशिष्ट सख्त हो जाता है।